The Last Trip
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सामने बिस्तर पर फोन रखा है. उसकी कुछ लाईट जली. शायद किसी का फोन है. पर अब किसका फोन होगा. दोस्त तो कोई है नहीं, बहन का फोन कभी दिन में आता नहीं. अक्सर शाम में या रात में ही कॉल आती है.
मुरारी अपने बिस्तर के बीच खड़ा है, दरवाजा बंद है. कमरे की लाइटें बंद हैं. बगल में फूलों का एक गुलदस्ता रखा हुआ है. किसी और ने नहीं दिए, खुद ही खरीदकर लाया था. अकेले इंडिया गेट जाना, अकेले पार्कों में घूमना, रास्तों में नाचते हुए चलना, भीड़ आते ही सर नीचे करके चुपचाप चलना, अकेले फ़िल्में देखना और कभी कभी अकेले ही ड्रिंक कर लेना. ये ही मुरारी की पिछली साल का कुल जमा इतिहास था.
मुरारी वैसे आलसी था, लेकिन कोविड के समय ऐसे हेल्थ रिपोर्टर के रूप में उभर कर सामने आया जैसे कि किसी मिशन पर हो, कोविड में आई दूसरी लहर के दौरान उसकी हेल्थ रिपोर्टिंग को अनगिनत लोगों ने सराहा. अनजान लोगों ने भी कहा- कितने साहसी हो कि अस्पतालों में रोते-बिलखते मरीजों के बीच घुस रिपोर्टिंग कर आते हो. उसकी खबरों ने न जाने कितने अस्पतालों को समय से ऑक्सीजन पहुंचवाई. फिर भी कुछ थे, जो सड़कों पर ही इलाज से पहले मर गए. फिर भी कुछ थे जो टेम्पों में से उतरने से पहले ही दम तोड़ गए. फिर भी कुछ थे जिन्हें लेने के लिए ऑक्सीजन नहीं पहुँची.
उसके सामने ही हजारों लोग मर गए, शमशानों में जगह भी न मिलती, श्मशानों और अस्पतालों के बीच झूलते मुरारी को एक अंतहीन डर ने घेर लिया. अब किसी भी आहट से उसे डर लगने लगता, रात को लगता कि किसी ने उसका दरवाजा खटखटाया है, चौबीस घंटे उसके फोन की रिंगटोन उसके कानों में गूंजती, किसी भी समय उसे लगता कि किसी का फोन है. किसी स्टोरी के लिए, किसी मरीज का, किसी डॉक्टर का. उसके मामा की मौत हुई थी तब उसे रात में ही कॉल आया था, इसलिए रात में आने वाली हर कॉल उसे डराती थी अगर घर से कोई ग्यारह बारह बजे कॉल कर दे तो किसी अनहोनी की आशंका से डर जाता था. कोविड में चीखते, दम तोड़ते लोगों को इतने नजदीक से देख उसके अन्दर एक खालीपन घर कर गया. शुरू में लगा कि कुछ दिन की बात है, लेकिन ये तो महीनों चल गया. अस्पताल से घर, घर से अस्पताल.
वो रात में अस्पताल से आता तो अपने रूम पार्टनर शुभम की बगल में सो जाता. सो क्या जाता, लिपट ही जाता. कभी शुभम से, कभी दूसरे रूम पार्टनर विनय से. लेकिन कुछ दिन से शुभम मना करने लगा था, कहने लगा था कि कोविड का टाइम है कुछ सहूलियत बरतनी चाहिए. तुम अस्पताल से आते हो, कुछ सावधानी बरता करो. एक दिन ऐसी ही किसी बात का मुरारी को बुरा लग गया, उसने तय किया कि क्यों अपने रूम पार्टनर्स को परेशानी में डालूं. हर रोज कोविड वार्ड जाना होता है तो ऐसे दूसरों की जान को मुश्किल में डालना सही नहीं. ये शायद उसका एक अच्छा और एक बुरा फैसला था.
कोविड अस्पतालों में मरते सैंकड़ों लोगों, बूढों, औरतों को देखकर उसके मन में एक अजीब तरह का भय, अजीब तरह का एकाकीपन था. यही रीजन था कि अस्पताल से आते ही वो अपने दोस्तों से लिपटकर सो जाया करता था, शायद दोस्त इस बात को न समझ सके कि इसके पीछे रीजन क्या है. एक तरफ हेल्थ रिपोर्टिंग, अस्पतालों में मरते लोग, दूसरी तरफ दोस्तों की चिंताएं, इन सबको जानते हुए उसने अलग घर ले लिया.
अब अकेले ही अस्पताल जाता और घर लौट आता. वो एक लड़की से प्यार करता था लेकिन कोविड के दौरान ही ऐसी दूरियां आईं कि ब्रेकअप हो गया, फिर भी उस लड़की से कुछ-कुछ बातें होतीं थीं. लड़की केयरिंग थी, लेकिन जैसे ही मुरारी को पता चला कि वो अब उसके एक रूम पार्टनर को ही पसंद करने लगी है तो वो थोड़ा पीछे हट गया, अब लड़की से बात करना भी बंद ही कर दिया. पर उसे ये बात बहुत खली कि जिन रूम पार्टनर्स के साथ वो रहा, उसी ने ऐसा करना सही समझा. वो इस बात को भी उससे जोड़ने का लगा कि उसके दोस्त को आखिर उससे तकलीफ क्यों होने लगी थी. क्यों वे नहीं चाहते थे कि वो साथ रहे. ये ऐसे सवाल थे जिनका उत्तर उस लड़के को नहीं मिल सकते थे इसलिए उसने दोस्तों से कटना शुरू कर दिया. इनके अलावा जो कुछ नार्मल दोस्त थे भी, अब उनसे भी कनेक्ट रहना बंद कर दिया. न किसी की कॉल आती, न वो कॉल करता. न किसी को मैसेज करता, न किसी का मैसेज आता, आता भी तो जवाब ही नहीं देता.
गर्मियों के दिन थे, गर्मियों के दिन खत्म होते होते ही उसका सब कुछ ढह चुका था, जिन्हें वो जीने का कारण मानता था वो दुर्ग अब बह चुके थे. एक दिन गर्मी की उमस तेज थी, सफदरजंग अस्पताल के बाहर अपनी बुलेट मोटरसाइकिल खड़ी की. अंदर घुसा ही था, कि अचानक एक कॉल आती है... कॉल उसके जीजा की थी. उसने बताया कि उसकी मां को सांस लेने में प्रॉब्लम आ रही है, मुरारी समझ गया पोस्ट कोविड इफेक्ट है, मुरारी ने सब छोड़ तुरंत अस्पताल ले जाने के लिए कहा. खुद भी दिल्ली से अलीगढ़ के लिए एक कैब ले ली. इस बीच बार बार कॉल करके पूछता रहा कि मां की तबियत कैसी है. लेकिन कोई कुछ नहीं बताए. अगले तीन घंटे में ही मुरारी अलीगढ़ सिटी हॉस्पिटल पहुँच गया. अंदर ही मेडिकल की दुकान के पास खड़ी बहन रो रही थी, बगल में जीजा जी भी कुछ सुबक रहे थे, बहन का रोना समझ आता है, लेकिन जीजा जी? किसी अनहोनी की आशंका उसे तभी हो गई. अलीगढ़ में पहुँचने से पहले ही उसकी मां की डेथ हो चुकी थी. मां को एक बिस्तर पर अंतहीन निंद्रा में सोये देख मुरारी के अंदर का बांध बह गया, जैसे पिछले सारे दुखों का हिमालय आज ही उससे हिसाब ले रहा हो, सामने मां को देख उसका मन द्रवित हो उठा. अंदर का लावा ऐसा निकला कि मुरारी मां से जा लिपटा. सबने उसे हटाने की कोशिश की. कुछ देर तक ऐसे ही रहा.
अस्पताल ने मां का शव ले जाने के लिए और अस्पताल का हिसाब करने के लिए कहा. मुरारी को डॉक्टर दिखा. अपने आप को कुछ संभालकर मुरारी ने डॉक्टर से पूछा कि क्या हुआ था मां को. डॉक्टर ने बताया कि ब्रेन तक ब्लड पहुँचने में रुकावट आ रही थी. अगर वक्त पर अस्पताल आ जातीं तो शायद बच जातीं, इन्हें शायद ये तकलीफ कोई चार पांच घंटे पहले से हो रही होगी. लेकिन इग्नोर किया होगा शुरू में. अगर यहाँ केवल आधे घंटे भी पहले ले आते तब भी शायद बच जातीं. इसके बाद रोते मुरारी को देख डॉक्टर ने उसके दोनों हाथ पकड़े और हिम्मत बंधाई. उधर बहन दिखी तो मुरारी उससे लिपटकर रोने लगा. कुछ देर अस्पताल में रुकने के बाद मुरारी और उसकी फॅमिली ने उसकी मां का अंतिम संस्कार कर दिया. ये दौर कोविड के पीक का था. मुरारी तीन दिन घर रहने के बाद दिल्ली चला आया. दिन रात, सुबह शाम उसे बस मां की ही याद आए और डॉक्टर की वो बात कि अगर आधे घंटे भी पहले आ जातीं तो बच जातीं. वे मरने के जैसी तकलीफ में नहीं थीं. इस बात ने मुरारी के मन में गिल्ट भर दिया कि मां की मौत का कारण कोई और नहीं बल्कि वो था. उसने एक अच्छे बेटे जैसा निभाया नहीं. बस अपनी रिपोर्ट्स, तारीफ में इतना घुस गया कि अपनी ही मां का ख्याल नहीं किया.
अपनी मां की मौत जा जिम्मेदार वो खुद को मानता था, उसे लगता था कि अस्पतालों की रिपोर्टिंग के दौरान न वो एक दिन के लिए घर जाता, न उसकी मां को कोविड होता. जिस दिन वो घर गया था. उसने पूरी कोशिश की थी कि दूर रहे सबसे. घर में जाते ही quarantine हो गया. लेकिन मां कहाँ इस ‘’छूने’’ की बीमारी को समझती थी. इससे पहले जितनी भी बार मुरारी दिल्ली से अलीगढ़ में अपने गाँव आता था, सबसे पहली पीछे पीठ पर लदा बैग उतारकर मां को ही कसकर हग करता था. मां भी उसे भींच लेती. लेकिन ये महामारी का दौर था, मां नहीं समझती थी, लेकिन मुरारी समझता था. ये दुनिया की अनोखी बीमारी थी छूने भर से हो जाती है, पास खड़े होने की अनुमति भी इस महामारी में नहीं.
खूब मना करने पर भी मां रात को आकर लिपट गई, इसके बाद वो वापस दिल्ली आ गया. अस्पतालों की रिपोर्टिंग करने. पता चला कि घर में मां को कोविड हो गया है. पिता पहले ही घर छोड़ चुके थे, जब वो पैदा हुआ था उससे पहले ही मां को पता चला था कि उसके पिता मां को पसंद नहीं करते. वे दूसरी शादी करना चाहते थे. मां अपने मायके आ गई यहीं नानी के घर रहने. मुरारी हमेशा हॉस्टल में पढ़ा. इसलिए सिर्फ प्यार रहा तो सिर्फ माँ से. मां को कोरोना होने की खबर मिली तो डॉक्टरों की लाइन लगा दी. अच्छे कनेक्शन थे तो सब इलाज अच्छे से करा दिया. लेकिन कोरोना के बाद मां की तबियत नासाज रहने लगी.
मां के सही होने पर मुरारी घर पहुंचा. कोविड की दूसरी लहर शुरू हो गई थी. अगले ही दिन मुरारी दिल्ली के लिए निकल लिया. मां ने रोका और मना किया, मां चाहती थी कि जब तक वो पूरी तरह ठीक नहीं हो जाती तब तक मुरारी उसके ही पास रहे, दूसरा कोविड में मरने की खबरें सुनकर मां भी डर रही थी और नहीं चाहती थी कि ऐसे वक्त में उसका बेटा अस्पतालों में घूमे, वो भी दिल्ली में, जहाँ सबसे अधिक लोगों के मरने की खबरें आ रहीं थीं. इधर मां ने बैग पकड़ लिया, उधर मुरारी ने मां की तरफ मुस्कुरा कर रहा, -जैसे आप बीमार हुईं आपको बचाना जरूरी था, वैसे ही अनगिनत लोग और हैं जिनकी कोई नहीं सुनता, उनकी भी खबरें दिखाना जरूरी है, उन्हें भी बचाना जरूरी है.’’
लेकिन मां एक नहीं सुनती. मां कहती रह जाती है और मुरारी अपना बैग पैक कर लेता है और मास्क पहनते हुए मां के पैर छूता है. मां का उदासीपन देख कुछ मुस्कुराता है और अंत में गले लगा लेता है, इसके बाद मुरारी अलीगढ़ रेलवे स्टेशन पहुंचकर दिल्ली के लिए निकल आता है. दिल्ली के अस्पतालों की हालत बद से बदतर हो रही थी, अस्पतालों में जगहें नहीं बचीं, ऑक्सीजन को लेकर भी खबरें आने लगीं. मुरारी को ट्विटर पर पढ़ने वालों की भी संख्या बढ़ने लगी, उसकी खबरें सबसे अधिक पढ़ी और देखी जाने लगीं, बाकी मीडिया हाउसेस भी उसको क्रेडिट देते हुए उसकी खबरों से ब्रेकिंग बनाते. उसके सोर्स बहुत अच्छे थे, कई बार ऐसा भी होता कि अस्पताल वाले किसी और से नहीं बल्कि उसे ही आपातकालीन मैसेज भेजते, वो मदद के लिए ट्विटर पर डालता और ऑक्सीजन अरेंज होता. उसकी खबरों का भारी प्रभाव होने लगा. इस बीच मुरारी सबसे डरपोक और साहसी इंसान होने के करतब में था, काम में साहसी और निजी जीवन में डरा हुआ, सहमा हुआ, आशंकित लड़का.
अक्सर उसकी मां खुद को दिल्ली ले जाने के लिए कहती थी, लेकिन हर बार मुरारी टाल देता था. मुरारी हर वक्त इस गिल्ट में रहने लगा कि अगर वो होता तो समय से इलाज मिल जाता और उसकी मां बच जाती. मां की मौत के बाद उसके मन में ये भी गिल्ट कर गया कि मां की मौत उसकी वजह से ही हुई है. अगर चाहता तो उस दिन दूर से ही माँ से मिलकर आ सकता था. लेकिन मां की जिद के आगे झुका ही क्यों, और क्यों टच करने दिया.
मां के जाने के बाद उसे वे एकाध कॉल आना भी बंद हो गए जो उसकी मां शाम के वक्त करती थी, और अक्सर शादी के लिए कहती थी, कभी कहती थी मुझे दिल्ली ले चल. मां के बाद अब कभी हफ्ते दो हफ्ते में बहन का फोन ही जाता था. कभी किसी क्रेडिट कार्ड वाले का आता, कभी रिचार्ज कराने के लिए कंपनी का. इसके अलावा बचे वे लोग जिन्हें अपनी नौकरी के लिए सीवी भिजवाना हो. ये था उसका पूरा निजी जीवन. इसके अलावा उसमें सिर्फ बचता था विरक्ति, हताशा, निराशा और एकाकीपन. बाकी सिर्फ अस्पताल, हेल्थ मिनिस्ट्री और अपनी ऑफिस. निजी जीवन में किसी से न मिलना, न किसी के घर जाना. ऑफिस से आने के बाद वो निरा अकेला हो जाता था, घंटों फोन की स्क्रीन टटोलता लेकिन कुछ न मिलता, कई बार फोनबुक में जाता, दो हजार से भी ज्यादा कॉन्टेक्ट्स, सबको ऊपर नीचे करता, स्क्रोल करता, कुछ पर कुछ मिनट ठहरता. सोचता कि कॉल कर दूँ. अंततः किसी को फोन न करता. फोन रख देता. हर दिन पास के नजदीक पार्क में जाता, वहां आते-जाते बड़े-बूढों को देखता और घर आ जाता. जहाँ वो नितांत अकेला होता. घर में लगीं मां की तस्वीरें और गर्लफ्रेंड से जुड़ी यादें उसके दिल को बिखेर जातीं, कोई समेटने वाला भी न होता. खुद मुरारी को अब इस बिखराव से ही लगाव था. उसके पलकों के नीचे हजार दिनों का रोना इकठ्ठा हो चुका था, जो अब हर रोज धीमी गति से बहता रहता.
अभी सामने बिस्तर के एक कौने पर मोबाइल पड़ा है, मुरारी बिस्तर के ऊपर खड़ा है, बगल में मां की ही कुछ तस्वीरें लटकी हुईं हैं, अगल बगल कपल्स के पैरों की तस्वीरें भी हैं, जो शायद उसकी और उसकी गर्लफ्रेंड के पैरों की होगी. अब तक आसूं नहीं थे उसकी आँखों, पर अब कुछ ढुलकने लगे हैं, बगल में मां की आखिरी तंबाकू की पैकेट रखी है, जिसे वो दिल्ली ले आया था. तंबाकू की पैकेट देखकर आँखों से आसूं निकल आए, रोया ऐसा कि आवाज न आई. मां कहती थी अगर मैं मर जाऊं तो तंबाकू की एक पैकेट मेरे सिराहने रख देना, मुझे तंबाकू के साथ ही जलाना. जिसे सुनते ही वो मां का मुंह बंद कर देता था. फोन पर होता तो चिल्ला देता था. लेकिन उसे क्या पता था मां के जाने के बाद उसके पास सिर्फ उसकी तंबाकू ही रह जाएगी.
तभी दूसरे किनारे पर पड़ा फोन दिखा. फोन में कुछ रोशनी आ रही है. शायद किसी का कॉल होगा. पर किसका? देखना चाहिए या या फंदे पर लटककर हमेशा के लिए सो जाना चाहिए? इस कसमकश में मुरारी बेड से नीचे उतर आता है. फोन नहीं था किसी का मैसेज था. मैसेज में लिखा है- ‘’मुरारी! तुमने जो खबर डाली है वो सही है न? कन्फर्म है न?’’
मुरारी- हाँ कन्फर्म है?
‘’पक्का ना?’’
‘’हाँ’’
‘’तुम जा रहे क्या कवर करने?’’
‘’नहीं मैं नहीं जा रहा’’
‘’मैं निकल रही हूँ, इसे कवर करने, तुम चलोगे?’’
‘’नहीं मैं दिल्ली के बाहर रिपोर्टिंग नहीं करता, वैसे खबर शायद सही है कि दस बच्चों की मौत हुई है बुखार से, हालाँकि मुझे बस एक लोकल ने मैसेज किया था. इसलिए एकदम कन्फर्म नहीं कह सकता.’’
‘’पर आपका ट्वीट वायरल चल रहा है. कुछ बता रहे हैं बुखार नहीं कोई और कारण है, और मरने वालों की संख्या भी दो बताई जा रही है, उतनी नहीं जितनी आपके ट्वीट में लिखी है, अभी किसी ने भी इस खबर को कवर नहीं किया. इसलिए मैं तुरंत निकलना चाहती हूँ.’’
मुरारी मैसेज चेक करने के बाद कुछ देर सोचता है. फिर ट्विटर खोलता है चेक करता है कि वाकई उसका ट्वीट वायरल है. सब कह रहे हैं कि गोरखपुर के बाद ‘पानीपत’’ में भी बच्चों की मौत हो गई है. गोरखपुर की घटना पर पहले से ही भारी बवाल मचा हुआ है. पूरे देश में प्रदर्शन चल रहे हैं, बताया जा रहा है कि इसमें हेल्थ मिनिस्टर की गलती है. उनके विभाग ने अस्पताल का ऑक्सीजन कहीं और शिफ्ट कर दिया था. जिससे बच्चों के लिए ऑक्सीजन की कमी पड़ गई थी. लेकिन अब खबर आ रही है कि पानीपत में भी गोरखपुर के जैसी घटना हुई है, ये खबर तुरंत ही बड़ी बनने लगी. इसके बाद मुरारी को लगा कि ये सच है या नहीं. दो तरह की बातें अभी आ रही हैं. इसे सोचते सोचते, बगल में रखी कुर्सी पर बैठ जाता है. इतने में ही दोबारा फोन में लाईट दिखाई देती है. मैसेज था- ‘’कुछ कांटेक्ट हैं क्या उधर का? उस आदमी का नंबर मिल सकता है जिसने ये खबर दी थी?’’
मुरारी- ‘’नहीं नंबर तो नहीं है’’
कुछ देर सोचकर अचानक मुरारी कहता है, तुम जा रही हो? उधर से मैसेज आता है कि हाँ, तुम्हें चलना है क्या? मुरारी कुछ सोचता है, और कहता है ‘’हाँ चल सकता हूँ’’ कौन कौन जा रहा है तुम्हारे साथ? उधर से मैसेज आता है कि हम तीन लोग हैं तुम चाहो तो साथ चल सकते हो कैब का खर्चा शेयर हो जाएगा. अपने ऊपर छत पर लटके फंदे को देखकर मुरारी कहता है, हाँ चलता हूँ. कहाँ मिलें?
अगले आधे घंटे में मुरारी तय जगह पर पहुँच जाता है. वहां पहले से ही स्मृति और श्रद्धा खड़ी हुई थीं, स्मृति वही लड़की थी जिसने मुरारी को मैसेज किया था, श्रध्दा उसके साथ थी, वे दोनों मुरारी और उमर का इंतजार कर रही थीं. जहाँ से उन्हें पानीपत के लिए निकलना था. कुछ देर में उमर भी आ गया, उमर उस कैब में ही था जिससे जाना था. स्मृति ने तीनों को एक दूसरे के बारे में बताया. स्मृति बोली तुम ऐसे स्माइल क्यों कर रहे हो, जैसे कि तुम दोनों एक दूसरे को जानते हो. मुरारी ने कहा हाँ मैं श्रद्धा को जानता हूँ पहले से, हम दोनों ट्विटर पर ही जुड़े हुए हैं. मुरारी और श्रद्धा एक दूसरे को जानते थे. बात होती थी लेकिन मिलने का प्लान नहीं कर सके. मुरारी को लगता श्रद्धा कहेगी तब मिलेगा. श्रद्धा को लगता मुरारी कहेगा तब मिलूंगी. हालाँकि दोनों ही एक दूसरे को कुछ कुछ पसंद करते थे, दोनों के काम को पसंद करते थे.
थोड़ी सी बातों के साथ ही तीनों कैब में बैठ जाते हैं. उमर आगे ही ड्राइवर के बगल में बैठा हुआ था. पीछे एक तरफ स्मृति और दूसरी तरफ मुरारी बैठा हुआ है, दोनों के बीच कम सी जगह में श्रद्धा बैठ गई. मुरारी कोशिश करता है कि वो उसका शरीर श्रद्धा से टच न करे. लेकिन जगह इतनी कम थी कि श्रद्धा के लिए भी ये मुश्किल था कि उसका शरीर मुरारी से टच न करे. लेकिन श्रद्धा ने ये चाहा भी नहीं, उसने थोड़े कूल अंदाज में मुरारी से कहा कि हाँ हाँ ठीक है. आराम से बैठ जा, इतना क्यों परेशान हो रहे हो. बचते बचते भी बार बार मुरारी श्रद्धा से टच हो ही जाता.
कुछ दूरी चलने पर श्रद्धा ने पहले स्मृति के कंधे पर सर रखा, कुछ मिनट ऐसे ही बीत जाने पर, मुरारी के कंधे पर भी अपना सर रख लिया और सोने की कोशिश करने लगी. हालाँकि हर तीस सेकंड पर उसकी आँखें खुल जातीं. एक तो बीच में बैठने के कारण पीछे सर रखने के लिए मुकम्मल जगह नहीं थी, दूसरा जगह जगह बेरिकेडिंग और खराब रास्ते की वजह से सोना मुश्किल था. शाम का वक्त था, इतना अधिक जाम, गाड़ी रुक जाती तो गर्मी लगने लगती. ये भी नींद की कोशिशों के बाद भी नींद न आने का एक कारण थी. मुरारी को श्रद्धा का सर अपने कंधे पर रखा जाना अच्छा लगा. ऐसे लगा जैसे उसे अपने दोस्तों के साथ फील होता था.
उमर और स्मृति दोनों क्लासमेट थे, उमर को स्मृति पहली नजर में ही पसंद थी. उमर थोड़ा शरारती, थोड़ा फनी था. कॉलेज में उसे स्मृति पसंद थी लेकिन कुछ कोशिश नहीं की. इस बीच उन दोनों के ही बैच के लड़के से स्मृति को प्यार हो गया. लड़के का नाम था अनस. लेकिन स्मृति ये अच्छे से जानती थी कि उमर उससे प्यार करता है. चूँकि दोनों दोस्त भी बन गए थे, एक ही ग्रुप में थे इसलिए कुछ कुछ फीलिंग्स उमर के प्रति उसमें थीं. जब उसने उमर से पूछा कि वो पानीपत जा रही है, चलेगा क्या तो उमर तुरंत तैयार हो गया.
उमर भी फ्रीलांसर पत्रकार है. चारों पत्रकारों का ग्रुप एक कार में जा रहा है. उमर ने कार में गाने लगा दिए. प्रतीक कुहाड़ के गानों पर सबकी सहमती थी, इसलिए धीमी धीमी आवाज पर गाने चलते रहे. शाम का वक्त था, थोड़े थोड़े सब लोग थके हुए ही थे. श्रद्धा ने एकाध बार स्मृति के कंधे पर हाथ रखा, कभी सर रख देती. लेकिन उसे मुरारी कुछ कुछ ठीक लगा, मुरारी जो एकदम शांत बैठा हुआ था, उसके कंधे पर श्रद्धा ने अपना सर रख दिया, कुछ देर बाद उसका हाथ भी अपने हाथ में ले लिया. एक तरफ इतना एन्जॉय करने वाली श्रद्धा, दूसरी तरफ कुछ कुछ शांत सा लड़का मुरारी.
जब सब शांत होते हैं तो सबसे अधिक अटेंशन उसे नहीं मिलती जो सबसे ज्यादा शोर मचा रहा है बल्कि उसे मिलती है जो उन सबमे सबसे शांत है. मुरारी सबमें शांत बैठा था. वैसे ये उसका रूटीन बिहेवियर नहीं था, लेकिन फेज ही ऐसा था, उसे बातबेबात डर लगता था. सो शांत ही बैठा था. सबने उससे बारी बारी से पूछा, कैसा लग रहा है. क्या खाओगे. कौन सा गाना चलाएं.
उमर अपनी मर्जी के गाने चलाता रहा. उसके गाने लगभग सभी को पसंद ही थे. फिर स्मृति ने अपनी पसंद के कुछ गाने चलवाए. फिर श्रद्धा ने भी. रास्ते में जाती भेड़ों, धान और गन्ने के खेतों को देखते ही मुरारी अपना फोन निकाल लेता. तस्वीरें लेने लगता. और फिर मोबाईल बगल में रख लेता. फिर कुछ दिखता और मोबाइल निकाल लेता, इसके आलावा कार की खिड़की से बाहर की ओर देखता रहता. शायद वो देखना चाहता था कि बगल में बैठी श्रद्धा उसे लेकर क्या कहेगी, क्या करेगी. वो चाहता था कि श्रद्धा उसे अटेंशन दे. लेकिन वो नहीं चाहता था कि चीजें उससे शुरू हों.
उधर उमर इतना खुश था कि आगे बैठकर भी बार बार पीछे मुड़कर देखता. पीछे बैठी स्मृति भी उसे देखती. दोनों पास में आकर कान में कुछ-कह देते. श्रद्धा इससे इरिटेट होती और बार बार गुस्सा करती. दूसरी तरफ मुरारी अपनी ही कार की खिड़की से अपनी ही धुन में बाहर देखता रहा. आते-जाते लोग, पीछे छूट जाते छोटे बड़े मकान, खेत खलिहान और दुकान. तभी मुरारी खिड़की से अपना सब लोगों की ओर करते हुए कहता है ‘’अरे’’...
फिर अचानक शांत हो जाता है. इस पर सब बोलते हैं अरे बोलो, बोलो जैसे तैसे तो कुछ बोले हो. मुरारी बोला एक गाना है. इतनी देर से याद कर रहा था. उसका म्यूजिक बहुत अच्छा है. कुछ दिन पहले ऑटो में सुना था. तुम लोग को भी अच्छा लगेगा. मैं पिछले आधे घंटे से इस धुन को याद करने की कोशिश कर रहा था. उमर वो लगा दो- ‘’अक्सर इस दुनिया में, दीवाने मिलते हैं.’’
ये सुनते ही सब मुरारी की मासूमियत पर सब हंस पड़े. उमर वो गाना लगा देता है. धीरे-धीरे मुरारी माहौल में शामिल होने लगता है, जिससे वो अब तक नदारद था. अपनी पसंद के कुछ गाने भी कहता है. उधर श्रद्धा और स्मृति दोनों बारी-बारी से गाने लगवाती हैं. कुछ देर बाद मुरारी कहता है मुझे फोन दो. मैं लगाता हूँ. उसके बाद मुरारी ने पहला गाना लगाया- LOCKED AWAY. सुनते ही श्रद्धा बोली- तुम अंग्रेजी गाने भी सुनते हो. और हंस देती है. इस पर मुरारी ने सिर्फ एक स्माइल दी.
सब लोग इस गाने को एन्जॉय करने लगे. श्रद्दा कहती है पता है तब से लेकर अब तक जितने भी गाने थे उन सबमें ये गाना सबसे अच्छा था. मुरारी कहता है- ऐसा तो नहीं है कि मैंने तुम्हारा दिल हैक कर लिया है. इस पर प्यार से झड़काते हुए श्रद्धा उसके बगल का हाथ अपने हाथ में दवा लेती है. फिर मुरारी अगला गाना बजाता है- ‘’हेलो’’. इसे सुनते ही फिर श्रद्धा कहती है तुम मेरी पसंद के गाने कैसे चला ले रहे हो? क्या तुमको पता है मुझे क्या क्या पसंद है? इसके बाद अगले कुछ गाने मुरारी चलाता है. सबसे ज्यादा सब लोग लैला फिल्म के गाने- ‘’ओ मेरी लैला’’ पर एन्जॉय करते हैं. श्रद्धा कहती है मैं कितने दिन से ये गाना ढूंढ रही थी पर आज मिला. कितना याद किया कि न जाने किस फिल्म का गाना है ये. ये सच में बहुत अच्छा गाना है. ऐसे करके मुरारी के सभी गाने श्रद्धा को पसंद आते हैं. इस बीच रास्ते में खाने के लिए गाड़ी रोकी जाती है.
गाड़ी में से उतरते ही उमर और मुरारी दोनों ही सिगरेट के लिए निकल लेते हैं. मुरारी स्मृति से कहता है तुम दोनों खाना आर्डर कर लो. हम अभी आते हैं. श्रद्धा पूछती है कि ड्राइवर भैया से भी पूछ लेते हैं कि वो खाना खाएं तो…. स्मृति होटल का मेनू देखती है और कढ़ाई पनीर आर्डर कर देती है. इस पर उमर कहता है इसको हमेशा कढ़ाई पनीर ही खाना होता है. मुरारी बोला मेन्यु देखा ही इसलिए जाता है कि इसमें कढ़ाई पनीर है कि नहीं..
खाना खाने के बाद गाड़ी फिर सुमसान रास्तों से गुजरते हुए पानीपत पहुँचने को होती है. गाड़ी के पानीपत पहुँचते पहुँचते रात के साढ़े दस बज चुके थे. स्मृति और मुरारी कहता है कि हमें अभी ही स्टोरी के लिए निकल लेना चाहिए. अस्पताल में जाकर देख लेना चाहिए कि क्या स्टेटस है? श्रद्धा और उमर मना करते हैं कि अभी थक गए हैं. स्टोरी सुबह करेंगे. लेकिन स्मृति थोड़ी गंभीर थी. अंततः स्मृति और मुरारी के कहने पर सब अस्पताल की ओर निकल लेते हैं. चारों ही सात-आठ घंटे का सफर करके थके हुए थे. रास्ते में लगे ट्रैफिक जाम ने समय और थकान दोनों ही बढ़ा दीं थीं.
अस्पताल में घुसना ही हुआ था कि स्मृति ने देखा कि अभी ही अस्पताल के बाहर एक औरत और तीन चार आदमी एक बच्चे को लेकर बाहर जा रहे हैं. श्रद्धा ने तुरंत कैमरा निकाला और शूट करना शुरू कर दिया. उन्होंने रोती हुई मां की ही वीडियो निकाल ली. रोती हुई मां कहती है- मेरे बच्चे को यहाँ एक हफ्ते से भर्ती किया हुआ है लेकिन मेरे बेटे को इलाज नहीं मिला. मेरा बच्चा बिना इलाज के ही मर गया.
एक तरफ अस्पताल कह रहा था कि नहीं बच्चों के मरने की कोई घटना यहाँ नहीं हुई है जिनकी भी डेथ हुई है नॉर्मली हुई है क्योंकि वे इलाज से पहले ही सीरियस केस थे. लेकिन इस महिला के साथ आए लोगों से बात करने पर पता चला कि यहाँ अब तक बीस मौत हो चुकी हैं, ये इक्कीसवीं मौत है. श्रद्धा ने तुरंत ही उनमें से एक आदमी का कांटेक्ट नंबर ले लिया. और अगले दिन बात करने की बात कही. ताकि उनसे पता लगाया जा सके कि किस-किस की मौत हुई है और अस्पताल में असल में चल क्या रहा है. इसके बाद कुछ और लोगों से स्मृति और उमर ने बात की.
बगल में ही बैठे एक गार्ड ने उन्हें कुछ इशारा किया. श्रद्धा गार्ड के पास पहुँच गई. गार्ड ने श्रद्धा से कहा- mam मैं आपको सबके नंबर दे सकता हूँ. लेकिन मैं आपसे यहाँ बात नहीं कर सकता. मैं कल आपसे बाहर मिल लूँगा. अगर यहाँ किसी ने मुझे आपसे बात करते देख लिया तो मेरी नौकरी चली जाएगी. जितने भी बच्चे मरते हैं ये उन्हें ऐसे ही रात में छुट्टी देते हैं ताकि किसी को पता न चले, जबकि ये बच्चा शायद दिन में ही मर गया होगा. श्रद्धा तुरंत गार्ड का नंबर लिख लेती है. स्मृति, उमर, मुरारी तीनों दूर खड़े श्रद्धा को देख रहे हैं. तीनों फिर अस्पताल में अंदर राउंड मारकर आते हैं. देर रात का वक्त था, सब लगभग सो लिए थे, पास में खड़ी नर्सें नींद के मारे परेशान लग रहीं थीं. एक नर्स ड्राप चढ़ा रही थी तो एक मरीज की गर्दन के नीचे तकिया रख रही थी. बगल में ही आरओ पानी भरा पुराना सा प्लास्टिक का बड़ा सा थर्मस रखा है, जिसका पानी भी वहीं आसपास फैला हुआ है. जिससे सबके जूते चप्पल गीले हो रहे.
इसके बाद चारों बाहर निकल आते हैं, बगल में ही एक झोपड़ी है, जिसपर कुरकुरे और चिप्स के कुछेक पैकेट लटके हुए हैं. ये चाय वाला भी एक दूसरे चाय वाले से 18-18 घंटे काम करने को लेकर प्रेरित लगता है. शायद ये 16-16 घंटे काम करता होगा. इसलिए रात के कोई एक बजे ही दुकान बंद करने को था. तभी चारों पहुँच जाते हैं, रिक्वेस्ट करते हैं कि बाबा पांच चाय बना दो. चार उनके लिए, एक ड्राइवर के लिए. इस दौरान चाय वाले से बात करने की कोशिश करते हैं कि अस्पताल में जो चल रहा है क्या वे उससे वाकिफ हैं. लेकिन दूसरे चाय वाले से यहाँ भी प्रेरणा लेते हुए इस चाय वाले ने इस विषय में कोई इंटरेस्ट नहीं लिया और चाय बनाने में लग गया. चाय खत्म करने के बाद उमर और मुरारी सिगरेट निकालते हैं जिस पर स्मृति और श्रद्धा TAUNT कसती हैं कि क्या यार हर वक्त सिगरेट. अभी जल्दी खत्म करो. एक बज गए. होटल ढूंढना है.
इसके बाद गाड़ी चलती है. ऐसे ही रास्ते में चार लड़के दिखाई देते हैं. श्रद्धा पूछती है भैया होटल है क्या आसपास. चारों ड्रिंक किये हुए थे. उनकी हरकतें देख मुरारी ड्राइवर से कहता है भैया गाड़ी आगे बढ़ा लो. बिना उनसे होटल का पता पूछे ही वे आगे निकल जाते हैं. मुरारी मैप पर देखता है कि गाड़ी वापस करने पर एक होटल है, होटल का नाम है- रॉयल होटल. वो उतना ही रोयलांत्रिक है जितना ये मुल्क लोकतांत्रिक है. इसका दरवाजा बंद है. उमर उसे खुलवाता है. जब वे कमरों का रेट पूछते हैं तो चारों चौंक जाते हैं और रेट सुनते ही मना कर देते हैं, होटल वाले ने भी ऐसे टरका दिया जैसे कि न्याय मांग लिया हो. और वो इतना ही महंगा मिलेगा, इससे सस्ता नहीं.
चारों वापस कार में आ जाते हैं. पास में ही एक दूसरा होटल भी था, उस होटल पर पहुंचते हैं. श्रद्धा, पूरी तरह मुरारी से टच करके ही बैठी हुई थी. मुरारी ने भी उसे जैसे दोनों ही हाथों से होल्ड कर लिया. ये ऐसी चीज थी जिसे कहने की जरूरत नहीं थी, ऐसे था कि जैसे दोनों समझते थे कि इस तरह के हग की दोनों को ही नीड है. मुरारी को अपना समझ आ रहा था लेकिन ये नहीं कि श्रद्धा उससे इतना क्यों टच होना चाहती है. इतनी ही देर में अगला होटल आ जाता है. सभी कार से उतर जाते हैं. इस बार भी उमर और मुरारी ने ही बात की. ऐसे लग रहा था यहाँ का होटल वाला रूम देने के लिए ही बैठा था. बिना अधिक मोलभाव किये आठ-आठ सौ रुपये में दो रूम मिल गए. बात करते करते पता चला कि इस होटल में और कोई है भी नहीं. सिर्फ वे ही पहले और आखिरी गेस्ट हैं. पूरा होटल 2014-15-16 के कांग्रेस दफ्तर की तरह खाली था. एक तो छोटा शहर, दूसरा कोरोना की वजह से अधिक ग्राहक आ जा नहीं रहे थे. होटल दिखाने वाला कद में छोटा सा कोई 30 साल का नशेड़ी लड़का था. रात के एक बजे सुरा पान किया हुआ था. जो ग्राहकों के आने को अपनी निंद्रा में खलल होने की तरह देख रह था. दीवार पर लटकी चाबियों को लेकर वो उन्हें तीसरे फ्लोर पर ले गया. पूरा होटल खाली और शुनशान. तीसरे फ्लोर पर दिखी लंबी सी गैलरी और दोनों तरफ कमरों की श्रृंखला देख, देखने वाले चारों पत्रकारों के साहस का फ्लोवर हो गया. इतना डरावना होटल?
श्रद्धा इसे देखकर कुछ असहज हुई. दोनों लड़कियां और लड़के एक साथ अलग-अलग रूम में चले गए. कमरे में अजीब सी खुशबु थी जैसे कि यहाँ महीनों से कोई आया ही नहीं. श्रद्धा और स्मृति एक कमरे में थे, उमर और मुरारी एक में. हालाँकि अन्दर ही अंदर चाहते चारों ही थे कि एक साथ सोएं. पर ऐसे सीधे नहीं कह सकते थे. सब अपने अपने-अपने कमरे में कपड़े बदलने लगे. थोड़ी ही देर हुई थी है कि अचानक उमर को स्मृति का फोन आया. उसने कहा यार किसी ने हमारे दरवाजे को हिलाया है. वे दोनों डरी हुईं थीं, होटल में उनके अलावा कोई और था भी नहीं सिवाय उस होटल दिखाने वाले मरियल लड़के के अलावा. उमर ने कहा ठीक है हम आते हैं. ये बात सुनके मुरारी और डर गया, पर उसके चेहरे, भाव, एक्शन में कहीं भी इस बात को नहीं देखा जा सकता था. जैसे झूठी मुस्कुराहट को ओड़ने का सीखने के आलावा डर छुपाना भी उसे आ गया था. रात के कोई डेढ़ बज चुके थे. दोनों स्मृति और श्रद्धा के कमरे में आ जाते हैं.
स्मृति कहती है यार डर लग रहा है- ऐसे लग रहा है कि शीशे के पीछे से कोई परछाई गई है. स्मृति कहती है यार तुम लोग इधर ही सो जाओ ना प्लीज. ये ऐसा प्रस्ताव था कि इसके लिए किसी सहमती की जरूरत नहीं थी. मुरारी अपने फोन का चार्जर लेने के लिए ही वापस अपने कमरे जाता है. इसके बाद मुरारी और उमर उसी कमरे में रुक जाते हैं . मुरारी और उमर रात की आखिरी सिगरेट जलाते हैं, इस बार स्मृति और श्रद्धा को झेल जाती हैं. श्रद्धा रात में ही होटल बदलने की भी कहती है लेकिन रात के डेढ़ बज चुके थे. श्रद्धा को परेशान और डरा हुआ देख मुरारी कहता है- मैं हूँ न!
इसके बाद चारों एक ही बेड पर बैठ जाते हैं. और एक खेल खेलते हैं. जिसमें वे एक दूसरे से सवाल पूछते हैं. श्रद्धा का नंबर आता है. श्रद्धा मुरारी से पूछती है- तुम्हारा ब्रेकअप कब हुआ और कैसे हुआ. मुरारी एक स्माइल के साथ कहता है- रहने देते हैं. श्रद्धा और स्मृति की जिद पर मुरारी बताता है कि उसका ब्रेकअप कैसे हुआ, कैसे वो और उसकी एक्स मिले थे. लेकिन एंड बताने से मना कर देता है. बस इतना ही कहता है- कि जो भी उसका फैसला था, अच्छा था. जो हुआ उसके बारे में नहीं बता सकता. बारी बारी से सवाल होते हैं. मुरारी ने सवाल पूछा कि अगर आप अपने को रेटिंग दें तो बताइए आप कितने फेक हैं दुनिया के आगे? इस सवाल पर सबके जवाब अलग-अलग थे, ऑनेस्ट थे. मुरारी ने एक और सवाल पूछा कि लाइफ में सबसे ज्यादा कौन सिखाकर गया? इसके जवाब में उमर ने बताया कि उसका एक टीचर था, जो वैसे बहुत अच्छे नहीं थे, लेकिन उन्होंने हमेशा उसे बूस्ट किया, उसके रंग-रूप को लेकर मोटिवेट किया, कांफिडेंस दिया जिसे वो सबसे कम महसूस किया करता था. इस बदलाव के लिए वो उन्हें हमेशा याद करता है. मुरारी ने ही एक और सवाल पूछा कि लाइफ में गिल्ट किस किस बात का है. सबसे अधिक गिल्ट किस चीज का है? स्मृति ने बताया कि लास्ट टाइम में अपनी दादी के पास न होने का. मैं उनके साथ हो सकती थी. लेकिन नहीं रही. इस बात का मलाल होता है. श्रद्धा ने बताया उसे अपने पहले वाले बॉयफ्रेंड के लिए गिल्ट होता है, जो उसके छोड़ जाने के बाद से आज तक मूव ऑन नहीं कर पाया. उसने अपनी पीएचडी भी बीच में छोड़ दी. और अभी घर पर ही है. सवालों के बीच ही श्रद्धा मुरारी के पैरों पर सर रखकर सो जाती है. ये सबके लिए इशारा था कि अब सो जाना चाहिए. एसी की आवाज इतनी आ रही थी कि चार लोग होते हुए भी उस डरावने होटल में उसकी आवाज और अधिक डरा रही थी. मुरारी ने जाकर AC बंद कर दी.
इसके बाद चारों एक ही बेड पर सो जाते हैं. लाईट बंद कर दी गई. सबने अपने अपने फोन चार्जिंग पर लगा दिए. एक तरफ उमर और स्मृति एक तरफ मुरारी और श्रद्धा. मुरारी सबसे साइड में एकदम उलट मुंह करके सो जाता है, अंदर ही अंदर उसे ये था कि श्रद्धा ही उसे पैंपर करे. उसके सीने पर अपना हाथ रख दे. कोई दो मिनट बीती होंगी कि श्रद्धा मुरारी के चेस्ट पर हाथ रख देती है. आहा! क्या स्पर्श है…
बंद कमरा, बंद लाईट, चारों ओर शांति. सिर्फ पंखे की आवाज या गर्म सांसों की मामूली सी दो आवाजें. श्रद्धा का हाथ मुरारी के सीने पर प्रेम कम, उससे सांत्वना, सहानुभूति और मदद के जैसा अधिक था. मुरारी उसका हाथ अपने हाथ से कस लेता है. कुछ देर बाद अपना हाथ उसके सर के नीचे ले आता है. अब मुरारी का चेस्ट और श्रद्धा का मुंह पास होते हैं. श्रद्धा के बालों मुरारी के मुंह पर आ रहे थे, मुरारी ने उन्हें कुरेदना शुरू कर दिया. अब तक सब श्रद्धा कर रही थी. अब मुरारी ने प्यार से उसका हाथ अपने हाथ में लेना शुरू कर दिया. और अचानक उसकी गर्दन पर किस कर दिया. दोनों एक दूसरे की तरफ हो जाते हैं. सामने से देखते हैं, मुरारी श्रद्धा की आँखों में देखता है. श्रद्धा मुरारी की आँखों में. बिना अधिक देरी किये श्रद्धा मुरारी के होठों पर किस कर देती है. बिना परवाह किये कि बगल में बाकी दो भी हैं, मुरारी और श्रद्धा एक दूसरे के पैरों पर पैर रख देते हैं. कुछ किस होते हैं, कुछ देर जागने के बाद मुरारी मोबाइल निकाल लेता है.
तीनों सो रहे हैं, श्रद्धा जागी हुई है. मुरारी अकेले ही सिगरेट पीने के लिए बेड से उठकर बगल में एक कुर्सी पर बैठ जाता है. एक गाना सुनता है. गाना था सिगरेट आफ्टर सेक्स का APOCALYPSE. इसके बाद श्रद्धा की बगल में लेट जाता है, आखिरी किस करता है और सो जाता है.
सुबह आठ-साढ़े आठ बजे सूरज की रौशनी कमरे में आती है. श्रद्धा को रात में कम ही नींद आई थी. फिर भी वही सबसे पहले जाग गई. चारों ने जागकर अपने-अपने कपड़े बदले और स्टोरी के लिए निकल गए. वहां के लोकल थाने से लेकर CMO और अस्पताल के लोगों से बात की. उन लोगों की स्टोरी निकाली जिनके बच्चों की डेथ हुई थी. उनमें से किसी की भी कोई शिकायत न CMO ने सुनी थी, न थानेदार ने, सब ने मान लिया कि यही नियति है कि एक दिन मर ही जाना है. बच्चों का मरना भी उसी नियति का हिस्सा मानकर गरीब जनता सहने की कोशिश कर रही थी. कोई कहने वाला नहीं कि इन बच्चों की मौत क्यों हुई? एक बच्चे की मौत नेचुरल डेथ हो सकती है, दो की मौत को भी प्राकृतिक मौत माना जा सकता है. मगर इक्कीस बच्चों की मौत, मौत नहीं मानी जा सकती, ये हत्या है. हालाँकि देश में हुई ऐसी घटनाएँ इंसानी दिल रखने वाले सभी जीवों का दिल दुखाती हैं. पत्रकार भी इससे अलग नहीं हैं. लेकिन पत्रकार के लिए उस दिन अधिक ख़ुशी मिलती है जिस दिन वे वो स्टोरी निकालें, जिसे अब तक दबाया जा रहा हो और जिसके जनता के सामने आने की सख्त जरूरत हो. इस रिपोर्ट के सभी पहलुओं को जान लेने और उनको कैमरे में उतारकर तय हुआ कि अब निकलना चाहिए.
करीब पांच बजने को थे. अगर अभी चल दें और अधिक जाम नहीं मिला तो रात बारह बजे तक दिल्ली पहुँच जाएंगे. सब पानीपत की आखिरी चाय पीने के बाद दिल्ली के लिए निकल लेते हैं. अब तक स्मृति और उमर भी श्रद्धा और मुरारी को लेकर सहज हो गए. ड्राइवर नदीम अलग ही खुश था. उसे इस बात की ख़ुशी थी कि एक चुपचाप आया लड़का अब एक लड़की के साथ है, शायद कुछ खुश भी.
उमर अगली सीट पर बैठ गया. पिछली सीट पर पहले की ही तरह मुरारी, श्रद्धा और स्मृति बैठ गईं, चारों दिन भर के काम और रात में नींद पूरी ना होने के चलते थके हुए थे. मुरारी भी. पर मुरारी में कुछ इनर्जी एक्स्ट्रा थी. शायद श्रद्धा के होने से ही. मुरारी ने श्रद्धा के कंधे पर अपना सर रख दिया. अपना खुद का ईयरफोन निकाला और गाने सुनने लगा. अगले आधे घंटे ऐसे ही रहा. श्रद्धा को पता था कुछ है मुरारी के साथ. खोया खोया सा पागल सा लड़का. और गाने भी वे नहीं सुनता जो इसने कार में चलाए थे. कल से लेकर आज तक इसके फोन में अभी भी एक ही बैकग्राउंड म्यूजिक चल रहा है. वो था वन डे मूवी का, ''WE HAD TODAY''.
ये बड़ी अजीब बात थी न उसमें कोई गाना है. न कुछ और, बस एक बैकग्राउंड स्कोर चलता रहता है. इस बात ने उसे कुछ आशंकित किया. पर उसने इसकी तह में जाना जरूरी नहीं समझा. इसके बाद उसने सोते हुए मुरारी की बाहों को पकड़कर उसके ही कंधे पर सर रख दिया. पूरे रास्ते पहले की ही तरह गाने बजे. जिन गानों को मुरारी शुरू में पसंद नहीं कर रहा था वे गाने भी मुरारी को अच्छे लगने लगे. अब उसने प्रतीक कुहाड़ के गानों पर मना नहीं कहा- बल्कि कहा कि इन्हें चलने दो. रास्ते में एक जगह खाने के लिए गाड़ी रुकी. फिर उमर और मुरारी ने सिगरेट पी. फिर पूरे रास्ते मुरारी और श्रद्धा दोनों एक दूसरे से कास के ही ही रहे. मुरारी ने नहीं जानने की कोशिश की कि श्रद्धा ऐसा क्यों कर रही है. मुरारी को श्रद्धा की कुछ बातें बहुत अच्छी लगीं. खासकर उसका हाथ पकड़ना. हाथ पकड़ने के लिए उससे कहना नहीं पड़ता था. श्रद्धा ऐसे थी कि जैसे पहले से जानती हो कि उसे सबसे ज्यादा NEED किस चीज की है.
रात के बारह बजे तक सब दिल्ली आ जाते हैं. रास्ते में बॉर्डर पर कुछ ट्रैफिक जरूर मिला. लेकिन चूँकि रात हो गई थी इसलिए सब जल्दी जल्दी खाली हो गया. कैब को बारी बारी सबको छोड़ना था. आखिरी में एक ही गाना चलता रहा- इंडियन ओशन बैंड का ''भोर''.. लाइव...
सबसे पहले स्मृति का स्टॉप आया. सबने उसे बाय बोला. हग किया. स्मृति के लिए ये यादगार ट्रिप थी. उसे अपने कॉलेज के उस लड़के से मिलने का मौका मिला जिसे वो पसंद करती थी, और जो उसे पसंद करता था. लेकिन एक और लड़का था जिसे वो अधिक पसंद करती थी और रिलेशनशिप में चली गई. उससे इतना प्यार करती थी कि कमिटमेंट के चलते उमर को सेक्सुअली टच भी नहीं किया, हाँ चाहा जरूर. इसलिए बस एक दूसरे पर हाथ रखकर सोये. लेकिन इससे ज्यादा दोनों ने कुछ नहीं बढाया. पर उसे समझ आ रहा था कि उमर के साथ उसका कोई कनेक्शन है. उसे मुरारी भी अच्छा लगा. श्रद्धा और मुरारी से वो पहली बार मिली थी, लेकिन जाते वक्त लगा नहीं कि कोई पहली बार मिले हैं. मुरारी और श्रद्धा को देखते हुए उसने बाय किया और चली गई. श्रद्धा और स्मृति कोविड के दौरान ही एक दूसरे के टच में आए थे, फिर एक ही साथ एक आर्गेनाईजेशन में काम करने लगीं. लेकिन मिलीं पहली बार थीं. चूँकि कोविड के दौरान लगभग सब लोगों ने या तो ग्राउंड से काम किया या घर से. उस दौरान दफ्तर बंद थे.
आखरी सीट पर बैठे मुरारी ने दोनों पैर खिड़की पर रख, पूरी सीट पर लेट गया और अपना सर श्रद्धा की गोद में रख दिया. थकी हुई श्रद्धा ने पूरा ध्यान इसी चीज पर लगा दिया कि उसे तकलीफ न हो, ताकि बचे दस बीस मिनट के रास्ते वो अच्छा फील करे. उमर अगली सीट पर बैठा था. बगल में ड्राइवर नदीम, जिनकी उम्र कोई चालीस होगी. पीछे श्रद्धा और मुरारी. श्रद्धा कभी उसके गालों पर किस करती. कभी उसके बालों को सहलाती. अगला स्टॉप मुरारी का ही था. मुरारी रुका तो कार रोक ली गई. ड्राइवर को सबसे अधिक पसंद मुरारी ही था. इसलिए नहीं कि उसमें कोई खास अच्छाईयां थीं, बल्कि इसलिए कि मुरारी से उसको सहानुभूति थी. जब उसने मुरारी और श्रद्धा के बीच के रिश्ते के डेवलप होते देखा तो वो अपने आप में बहुत खुश था. रास्ते में जब कभी उसे मुरारी उदास दिखता तो सबको छेड़ता खासकर श्रद्धा को कि वो उसे मनाए.
उमर का स्टॉप उस गाड़ी के रूट से थोड़ा अलग था, अगर एक उसे छोड़ने जाते तो बाकी लोगों के लिए डेढ़ बज लेता. खासकर श्रद्धा के घर से कॉल आ रहीं थीं. इसलिए उमर ने सोचा वो दूसरी कैब से निकल जाएगा. उमर एक CNG गैस पंप के सामने रुक जाता है. सब लोग गाड़ी से बाहर निकल आए. उमर कुछ इमोशनल था. उमर ने कहा- यार बहुत बहुत बहुत, सच में बहुत अच्छा लगा. तुम्हारी रिपोर्ट्स पढता था, ट्वीट देखता था. ऐसे लगता था जैसे कोई एरोगेंट सा लड़का होगा. पर तुम बहुत अच्छे हो. मन नहीं कर रहा कि ये ट्रिप खत्म हो.
मुरारी ने भी कहा- उमर तुम भी बहुत अच्छे हो. इतने से आगे मुरारी ने कुछ नहीं कहा सिर्फ स्माइल करते रहा. शायद ये स्माइल ही थी जो बता रही थी कि उसे कितना अच्छा महसूस हो रहा है. कहाँ से शुरुआत हुई और कैसे उसका अंत हुआ. एक शांत लड़का अब शर्माते हुए सिर्फ मुस्काए जा रहा है. पास खड़ी श्रद्धा को देखकर मुरारी कहता है- श्रद्धा भी बहुत अच्छी है. इसके बाद मुरारी श्रद्धा और उमर से बारी बारी हग करता है. और फिर दोबारा कहता है तुम सब बहुत अच्छे हो. उमर के सामने ही श्रद्धा कहती है- ''थैंक यू''... और इसके आगे कुछ नहीं कहती. इसके बाद कहती है क्या हम एक मिनट बात कर सकते हैं अकेले में? उमर और नदीम बगल में हो जाते हैं. रह जाते हैं मुरारी और श्रद्धा. श्रद्धा उसका हाथ पकड़कर थोड़ी दूर ले जाती है. और कहती है- थैंक यू!
मुरारी कहता है- पागल हो हाँ? बोलना मुझे चाहिए थैंक यू. तुम कितनी अच्छी लड़की हो.
मुरारी की बात पूरी करने से पहले ही श्रद्धा उसे टोक देती है और कहती है-तुम्हें मालूम नहीं तुम मेरे लिए कितने स्पेशल हो. इतने दिन से मैं किस फेज में हूँ ये अभी नहीं बताउंगी. पर बताउंगी. सब बताउंगी. इस पहली ट्रिप ने मुझे कितनी होप दी है. मैं तुम्हें परेशान नहीं करुँगी, कभी नहीं कहूँगी कि प्यार है. कुछ भी असहज नहीं करुँगी, बस ये मेरे लिए मुश्किल वक्त था. पर अब नहीं है, इस ट्रिप के बाद नहीं है. मैं और जीना चाहती हूँ. खूब सारा जीना चाहती हूँ. खूब सारा घूमना चाहती हूँ. अगर मेरे हिस्से में लिखा होगा. तो क्या पता हम दोबारा इसी तरह अनजानी राहों में मिलें. तुम ही गा रहे थे न- अक्सर इस दुनिया में अनजाने मिलते हैं. और मुझे कुछ नहीं कहना सिवाय इसके कि ‘’Thank You for everything you gave me’’
मुरारी कहता है.. कहने को तो मेरे पास भी एक दुनिया है, पूरा समन्दर ही है कहने को. लेकिन तुम पागल हो. इतना कहकर मुरारी श्रद्धा को हग कर लेता है.
मुरारी बाहर सड़क किनारे खड़ा है, पीछे CNG का स्टेशन है. दूसरी तरफ उमर और श्रद्धा कार में बैठ गए. ड्राइवर गाड़ी स्टार्ट कर देता है. एक बार फिर मुरारी कार के पास पहुँचता है. और कहता है- ये ट्रिप खत्म नहीं होनी चाहिए थी. ये मेरे लिए बहुत इम्पोर्टेन्ट थी. काश कभी फिर जाएं. उमर से हाथ मिलाने के बाद पीछे बैठी श्रद्धा की खिड़की के पास जाता है. खिड़की से ही हग करने के दौरान श्रद्धा उसके गाल पर एक प्यार भरा किस कर देती है. ये चुंबन गाल से उतरकर मुरारी के सीने में ठहर गया.बाय- बाय और फिर मिलते हैं जल्दी कहकर गाड़ी चल दी.
मुरारी एक दूसरी कैब में बैठ गया जो उसे उसके घर तक ले गई. उमर और श्रद्धा बारी बारी से अपने स्टॉप पर उतर जाते हैं. मुरारी भी घर पहुँच जाता है.. रास्ते में मुरारी सोचता आया कि श्रद्धा को शायद उसकी नीड है, उसने कहा था कि उसे मेरे मिलने से होप मिली है. शायद मुझे कुछ रुकना चाहिए, ठहरना चाहिए. शायद कुछ अच्छा हो. वह क्यों कोई नए दोस्त नहीं बनाता था. अगर बनाता तो ऐसे दोस्त मिलते. स्मृति मिलती, उमर मिलता,श्रद्धा मिलती…. नदीम जैसे भी इंसान हैं जो मुझे खुश देख कितने खुश हुए.
यही सोचते हुए मुरारी काफी देर तक दरवाजे पर ही खड़ा रहा. फिर कुछ मिनट दरवाजे पर ही रुकने के बाद मुरारी दरवाजा खोलता है. दरवाजे के बगल में कूड़े का डिब्बा है. मुरारी सबसे पहले अपना बैग बगल में रखता है. कुछ देर बगल में रखी एक कुर्सी पर बैठ जाता है. उसके बगल में एक टेबल लैंप है. उसे जलाता है. सामने मां की तस्वीरें लगीं हुईं हैं. कुछ पिछली प्रेमिका की. कुछ चे ग्वेरा की. टेबल पर रखे गुलाब के फूल मुरझा चुके हैं.
मुरारी उन्हें देखता है. मुस्कुराता है. ये वही फूल थे जिन्हें वो अपने लिए लेकर आया था. अचानक मुरारी की नजर अपने दरवाजे पर जाती है. जो अंदर से बंद है. लेकिन बंद तो किया ही नहीं था? इसके बाद मुरारी सामने बिस्तर की ओर देखता है… सामने फांसी का फंदा है,... उसका शरीर लटका हुआ है. नीचे बगल में बैठने का एक स्टूल जमीन पर पड़ा हुआ है. बिस्तर से एक फूट ऊपर उसके पैर हैं. कमरे की लाईट बंद है. खिड़कियाँ बंद हैं. बिस्तर की बगल वाली टेबल पर फोन रखा हुआ है, जिसकी अभी कुछ लाईट जल रही है.
शायद किसी का मैसेज था…. मैसेज में लिखा था- ‘’मुरारी! तुमने जो खबर डाली है वो सही है न? कन्फर्म है न?’’
(कहते हैं मरने के कुछ सेकंड तक शरीर जिंदा रहता है. कुछ घंटों तक किडनियां, आँखें, दिल जिंदा रहता है. बस उनके बस कुछ नहीं रहता. दिल सुनता है, किडनियां चलती हैं और ऑंखें देखती हैं. मुरारी की आँखें उस फोन की लाईट में शायद उसी दुनिया को देख रही हैं, सोच रही हैं. शायद उस दुनिया में उसके लिए कुछ रखा था… उसे नहीं छोड़ना चाहिए था)
❣️👌🏻
ReplyDelete❤️😍🙌
Deleteबहुत-बहुत धन्यवाद भईया.... जो आपने जीवन की अनसुनी सच्चाइयों को हम लोगों को बताया।
ReplyDeleteभावुक कर गए भैया आप
ReplyDeleteबेहतरीन लिखते हैं भैया
भैया जी आपने तो इस story से हमे भावुक कर दिये.बहुत ही बेहतरीन story है good 🙏🙏
Deleteबेहतरीन ♥️🙏
ReplyDeleteGuru kya likhe bahut bahut dhnyabaad
ReplyDeleteVary Nice
ReplyDelete❣️💯👌👌
ReplyDeleteमंत्रमुग्ध प्रस्तुति
ReplyDelete😭😭😭😭
ReplyDeleteअन्तिम भाग पढ़ कर अनायास ही गालों पर आंसू लुढ़क आए।
ReplyDelete❤️
ReplyDeleteबेहतरीन लेख
ReplyDeleteUncle बहुत ही अच्छी और सच्ची कहानी हालांकि कुछ फेज पढ़ने के बाद आंसु आ जाते है , मन दुःखी होता है और मानो तो जैसे दुःख कि विलासिता खत्म ही नहीं होती , लेकिन फिर खुशी ही मिली uncle मैं अगला भाग जानना चाहता हूं
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